''तुम्हारा शहर”
तुम्हारा शहर …
कितने साल बाद आज फिर उसी शहर की मिट्टी पर कदम रखा।
****ganj का स्टेशन वैसा ही था — भीड़ वही, चाय की भाप वही, पर दिल की हालत पहले जैसी नहीं थी।
प्लेटफॉर्म पर उतरते ही लगा जैसे वक्त पीछे लौट गया हो।
यहीं तो वो आख़िरी बार जी भर के रोया था….वो 2019 का साल आँखों में ढेर सारे सवाल, और होंठों पर आधी सी मुस्कान।
स्टेशन से बाहर निकला तो सड़कों ने पहचान लिया।
वो पुरानी गली… जहाँ वो दुपट्टा संभालते हुए तेज़-तेज़ चला करती थी।
वो मिठाई की दुकान… जहाँ पहली बार उसके साथ जाने पर कुछ बेवज़ह ही कुछ ख़रीद लिया था, बस उसके साथ दो मिनट और चलने के लिए।
**गंज की हवा में आज भी उसकी खुशबू थी।
मैं उसी मोड़ पर जाकर रुका, जहाँ उसने कहा था —
देखो यहाँ से यहाँ की टेम्पो मिलती है और फिर उस टेम्पो के सबसे पीछे वाली सीट पर बैठ कर वो तुम्हारे घर जाने तक का सफ़र ज़िन्दगी का सबसे हसीन सफ़र था …
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