अहमियत

 आज अपने कुछ जज़्बात लिख रहा हूँ…

अक्टूबर धीरे-धीरे बीत रहा है, चंद दिनों में नवंबर दस्तक देगा। ठंडी हवाएँ, ओस से भीगी सुबहें, मिट्टी की ख़ुशबू और हल्की चाँदनी रातें..पता नहीं क्यों, साल के ये महीने मुझे बहुत अच्छे लगते हैं, जैसे मन को एक अलग ही सुकून मिलता हो।

ऐसे मौसम में मन बरबस ही बचपन, पुराने दिनों और कुछ अनकहे एहसासों में खो जाता है। चेहरे पर मुस्कान आती है, मगर दिल के किसी कोने में ये सोचकर उदासी भी होती है कि काश, कुछ पल वहीं ठहर गए होते। वक़्त कितनी तेज़ी से गुज़र रहा है और उसके साथ कितना कुछ धीरे-धीरे बदल रहा है।

कुछ चेहरे अब पहले-से नहीं लगते, कुछ बातों में वो पुरानी गर्माहट नहीं रही..और कुछ रास्ते शायद ख़ामोशी से अलग होने लगे हैं। कभी-कभी मन उन्हीं एहसासों को याद करता है, जो कभी बहुत अपने हुआ करते थे।

ज़िंदगी की भागदौड़ में अपनी मंज़िल तलाशते हुए अब बस कुछ पल का सुकून चाहिए, कोई पुरानी याद, कोई मीठा-सा एहसास और थोड़ी-सी ख़ुशी।

अजीब है न..वक़्त आगे बढ़ता रहता है, लोग बदलते रहते हैं, रास्ते अलग होते रहते हैं..मगर दिल का एक हिस्सा कुछ यादों में वहीं ठहरा रह जाता है। शायद कुछ चीज़ों की अहमियत भी उनके पीछे छूट जाने के बाद ही समझ आती है।

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